Tuesday, June 30, 2015

Dhram , धर्म

जो दयाभाव सिखलाता है, धर्म वही कहलाता है,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
सबरी के खा के झूठे बेर , भक्त्त  का मान बढ़ाता है ,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
विष का पीकर प्याला जो , दुनिया को बचाता है ,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
सर्वेः भवन्तुः सुखिनः का जो भाव मन में जगाता है ,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
गीता का देकर ज्ञान जो, कर्म का पाठ पढ़ाता है ,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
सारी दुनिया को मान के अपना, वसुदेवकुटंबकम् बतलाता है,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
मुरली की जो छेड़ के तान , प्रेम का राग सुनाता है ,
धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
जो दयाभाव सिखलाता है, धर्म वही कहलाता है,
जी धर्म वही कहलाता है, जी धर्म वही कहलाता है। 
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