Wednesday, November 29, 2017

योग को जाने समझे (अष्टांग योग)

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan
योग को जाने समझे   (अष्टांग योग)

आज सभी लोग योग के नाम से परिचित होगे मगर जब भी योग शब्द का जिक्र आता है तो लोग उसे सिर्फ आसान या शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित समझते है। मगर सिर्फ आसान ही योग नही है वो मात्रा योग का एक अंग है। महर्षि पतंजलि के अनुसार योग चित्तवृत्ति का निरोध  है

  " योगश्चितवृत्तिनिरोध:।"

 योगसूत्र के रचनाकार पतञ्जलि हैं। योगसूत्र में चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है। पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है। अर्थात मन को इधर उधर भटकने न देना, केवल एक ही वस्तु में स्थिर रखना ही योग है। 

 इसकी  सिद्धि के लिये उन्होंने योग के आठ  'अंग' बताये है  और जिन्हें अष्टांग योग कहाँ गया है अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) 'बहिरंग' और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) 'अंतरंग' नाम से प्रसिद्ध हैं। 
'यम' और 'नियम' वस्तुत: शील और तपस्या के द्योतक हैं।

यम - यम का अर्थ है संयम जो पांच प्रकार का माना जाता है :
 (1)अहिंसा,
 (2) सत्य, 
(3) अस्तेय (चोरी न करना अर्थात्‌ दूसरे के द्रव्य के लिए लालसा न रखना)
(4) ब्रह्मचर्य
(5) अपरिग्रह (धन संपत्ति का अनावश्यक संचय ना करना)

नियम- इसी भांति नियम के भी पांच प्रकार होते हैं : 
(1) शौच,
(2) संतोष, 
(3) तप,
(4) स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन)
(5) ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना)। 

आसान-  "स्थिर सुखमासनम्‌" आसन से तात्पर्य है स्थिरभाव से सुखपूर्वक बहुत समय तक बैठ सके वही आसान है।

प्राणायाम-प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना है प्राण + आयाम अर्थात प्राणों का विस्तार। आसन की स्तिथि में श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का लेना श्वास और भीतरी वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है।
प्राणायाम के अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और साधक अपने मन की स्थिरता के लिए अग्रसर होता है। 

 प्रत्याहार-प्राणायाम द्वारा प्राण के अपेक्षाकृत शांत होने पर मन का बहिर्मुख भाव स्वभावत: कम हो जाता है। फल यह होता है कि इंद्रियाँ अपने बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती है। इसी का नाम प्रत्याहार है (प्रति=प्रतिकूल, आहार=वृत्ति)। अब मन की बहिर्मुखी गति निरुद्ध हो जाती है और अंतर्मुख होकर स्थिर होने की चेष्टा करता है। 

 धारणा -देह के किसी अंग पर (जैसे हृदय में, नासिका के अग्रभाग पर) अथवा बाह्यपदार्थ पर (जैसे इष्टदेवता की मूर्ति आदि पर) चित्त को लगाना 'धारणा' कहलाता है।

ध्यान-ध्यान धारणा से आगे की दशा है। जब उस देशविशेष में ध्येय वस्तु का ज्ञान एकाकार रूप से प्रवाहित होता है, तब उसे 'ध्यान' कहते हैं। धारणा और ध्यान दोनों दशाओं में वृत्तिप्रवाह विद्यमान रहता है, परंतु अंतर यह है कि धारणा में एक वृत्ति से विरुद्ध वृत्ति का भी उदय होता है, परंतु ध्यान में सदृशवृत्ति का ही प्रवाह रहता है, विसदृश का नहीं। 

समाधि-ध्यान की परिपक्वास्था का नाम ही समाधि है। चित्त आलंबन के आकार में प्रतिभासित होता है, अपना स्वरूप शून्यवत्‌ हो जाता है यही समाधि की दशा कहलाती है।

अंतिम तीनों अंगों का सामूहिक नाम 'संयम' है जिसके जीतने का फल है विवेक ख्याति का आलोक या प्रकाश। समाधि के बाद प्रज्ञा का उदय होता है और यही योग का अंतिम लक्ष्य है। 

कालांतर में योग की विभिन्न शाखाएँ विकसित हुई जिन्होंने बड़े व्यापक रूप में अनेक भारतीय पंथों, संप्रदायों और साधनाओं पर प्रभाव डाला। "चित्तवृत्ति निरोध" को योग मानकर यम, नियम, आसन आदि योग का मूल सिद्धांत उपस्थित किये गये हैं। प्रत्यक्ष रूप में हठयोग, राजयोग और ज्ञानयोग - तीनों का मौलिक यहाँ मिल जाता है। इस पर भी अनेक ग्रन्थ  लिखे गये हैं। आसन, प्रणायाम, समाधि आदि विवेचना और व्याख्या की प्रेरणा लेकर बहुत से स्वतंत्र ग्रंथों की भी रचना हुई। यह भी कहा गया है कि जो लोग योग का अभ्याम करते हैं, उनमें अनेक प्रकार को विलक्षण शक्तियाँ आ जाती है जिन्हें 'विभूति' या 'सिद्धि' कहते हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठों योग के अंग कहे गए हैं, और योगसिद्धि के लिये इन आठों अंगों का साधन आवश्यक और अनिवार्य कहा गया है। इनमें से प्रत्येक के अंतर्गत कई बातें हैं। कहा गया है जो व्यक्ति योग के ये आठो अंग सिद्ध कर लेता है, वह सब प्रकार के क्लेशों से छूट जाता है, ।

अष्टांग, आठ अंगों वाले, योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।

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