8/2/18

The true yoga

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan

योग हजारो वर्षो से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य मत्वपूर्ण ग्रंथों में योग का ज़िक्र मिलता है। और ऐसे भी कई ग्रंथ है जो पूर्ण रूप से ही योग को समर्पित है। परन्तु आज के आधुनिक युग मे योग, योगा बनकर सिर्फ एक शारीरिक प्रक्रिया तक ही सीमित हो गया है। कही रेतीले बिच पर तो कही गर्म  हवाओ के बीच कठिन आसन कराकर उसे ही योग के नाम पर बेचा जा रहा है। वो जीविकोपार्जन का माध्यम हो सकते है परन्तु योग नही। वास्तव में योग मात्र एक शारीरिक प्रक्रिया नही यह तो शारीरिक के साथ मानसिक, वैचारिक, दार्शनिक, आद्यात्मिक प्रक्रिया है या यूं कहें के परम्परा से चली आ रही एक उत्कृष्ठ जीवन शैली है। ये तो उत्तम जीवन जीने की एक कला है।
आप खुद विचार कीजिये यदि सिर्फ शरीर को लचीला बनाकर उसे तोड़ना, मोड़ना ही योग है तो क्या आप सड़क/सर्कस में करतब/ खेल दिखाने वाले जो एक छोटे से घेरे से अपने पूरे शरीर को निकाल लेते है? योगी है क्या वो योग कर रहे है? नही ना 
तो वास्तिविक योग है क्या और जिन आसनो को ही हम योग समझ रहे है वो क्या है?
वास्तव में आसन योग का एक महत्वपूर्ण अंग जरूर है परन्तु पूर्ण योग नही । योग के प्रमुख ग्रंथ महर्षि पतंजलि कृत योगसूत्र में आसन को समझते हुए कहा गया है।

                              स्थिरसुखमासनम्  (पतंजलि योग सूत्र 2 /46  )

अगर इसे समझे तो इसमें स्थिर , सुख और आसन है अर्थात जिस अवस्था मे सुखपूर्वक स्थिर राह सके  वही आसन है। अर्थात इसमें शरीर की स्थिरता और सुख महत्वपूर्ण है। आप चाहे कितना भी कठिन आसन लगये अगर उसमे स्थिरता नही सुख की अनुभूति नही वो आसन नही। वो व्यायाम हो सकता है । और दूसरी बात अगर आप आसन की अवस्था को भी प्राप्त कर लेते है तो वो सिर्फ आसन है योग नही । योग आसन का एक हिस्सा है योग नही।
वैसे तो हमारे ग्रंथो में योग के कई रूपो का वर्णन है जैसे राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, लययोग, ज्ञानयोग, मंत्रयोग, हठयोग इत्यादि परंतु अगर सही अर्थों में कहे तो ये एक दूसरे से भिन्न जरूर दिखते है परन्तु ये सब एक ही है क्योकि इन सबका उद्देश्य एक ही है। साधारण शब्दो मे कहे तो ये एक मंजिल को प्राप्त करने के अलग अलग मार्ग है। किसी भी मार्ग पर चलकर योग के चरम को प्राप्त किया जा सकता है।
अगर हम राजयोग को माध्य्म बनाकर योग को समझे तो पतंजलि कृत योग सूत्र में योग के आठ अंग बातये है जिस कारण इसे योग भी कहते है।


इसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रतिहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये बातये है इसके अनुसार भी आसन मात्र एक अंग है। इसके साथ अन्य भागों को भी महत्व दिया जाना चाहिय।
पतंजलि योग सूत्र की ही योग की एक अन्य परिभाषा से  भी योग को समझने का प्रयास करते है

                  योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः  (पतंजलि योग सूत्र 1 /2 )

चित्त की वृतियों के निरोध को ही योग कहते है। इस आधार पर भी योग शारीरक के साथ मानसिक प्रक्रिया है। क्योकि इसमें चित्त  है चित्त का तत्प्रय अन्तःकरण से है ।अर्थात मन, बुद्धि, अहंकार , आत्मा ये सभी चित्त का हिस्सा है। इस चित्त को ज्ञानेद्रियों द्वार ग्रहण किये गये विषयो से रोकना ही योग है। या कहे के चित्त की निर्मलता ही योग है इसी से कैवल्य की प्राप्ति होती है। और योग की सभी विधाएं चित्त की वृतियों को रोकने का माध्यम है। 
अर्थात जब तक मन मे सत्यता , पवित्रता, परोपकार इत्यादि गुण नही आ जाते तब तक योग संभव नही।

अतः योग तभी सिद्ध होगा जब वो जीवन मे उतर जाएगा। आपके जीवन , अचार - विचार का एक हिस्सा बन जायेगा। अगर योग करने के साथ आप भोगविलसित मे लगे है तो वो योग नही जीविकोपार्जन का एक माध्यम है जो मात्र एक शारीरिक व्यायाम है।


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