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भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan भारतीय दर्शन विश्व के प्राचीनतम दर्शनो में से एक है इसमें अनेक वैज्ञानिक सिंद्धान्तो को प्रतिपादि...

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Truth of life ,जीवन का सत्य बताती एक कविता, मैं बैठा गंगा के तट पर

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan


जीवन का सत्य बताती एक कविता 


मैं बैठा गंगा के तट पर
सोच रहा जीवन है क्या।
कल कल करता बहता ये जल
कहता बस एक ही बात।
जो कल था वो आज नही
जो आज यहाँ वो कल खो जाता।
पर ये गंगा का तट वहीँ
रहती गंगा की धार वही।।
क्या खोया क्या पाया जग में
सब कुछ यही  धरा रह जाता।
गौमुख से चलकर, गंगासागर में मिल जाना 
फिर मेघो के पंखों पर चढ़कर ,नया जन्म है पाना।
चक्र यही है जीवन का भी 
जो  बस यूं ही चलते  है जाना ।
मैं बैठा गंगा के तट पर
सोच रहा जीवन है क्या।
झूठ सच की गठरी बाँधी।
सोने चांदी के ढेर लगाए।।
मैं मै कर माया जोड़ी ।
साथ न जाये फूटी कौड़ी।।
घोड़ा गाड़ी महल दुमहले ।
सब पीछे रह जाता है
भाई बंधु रिश्ते नाते
साथ कोई ना जाता है।
क्या खोया क्या पाया जग में
सब कुछ यही  धरा रह जाता है।
मैं बैठा गंगा के तट पर
सोच रहा जीवन है क्या।

-AC




human have alien's DNA, the new theory of evolution

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan


अक्सर हम इंसान सोचते है के  इस धरती पर इंसानी अस्तित्व की शुरुआत कैसे हुई आखिर हम इंसान का विकास कैसे हुआ तो इसका जवाब हमारी आधुनिक  विज्ञान की किताबे  ये बताती  है कि हमारा विकास बंदरों से हुआ, हो सकता है वो सही हो, परन्तु ऐसा कैसे संभव है की उसके बाद लाखो सालो में एक भी बन्दर इंसान नहीं बना शायद हममे से किसी ने कभी किसी बन्दर को इंसान बनते नहीं देखा शायद डार्विन की ये कहानिया कुछ हिन्दू धर्म ग्रंथो में पढ़ी कुछ घटनाओ के आधार पर निर्मित की गयी हो जैसे उनकी थ्योरी ऑफ़ ऐवेलूशन सीधे सीधे दशावतार की कथा से प्रेरित है परन्तु वैज्ञानिको का ये मत की इंसान बन्दर से परिवर्तित हुए है ये कैसे कहा जा सकता है आप सोचिये अगर ऐसे ही कोई जीव दूसरे जीव में बदल गया होता तो ये परिवर्तन आज भी चल रहा होता और आज की उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक समझ और जाँच उन्हें पकड़ भी पाती मगर ऐसा कही नहीं हो रहा है क्योकि ऐसा हुआ नहीं ऐसा किया गया जो वो दशावतार का घटनाक्रम दीखता है जिसे डार्विन ने थ्योरी ऑफ़ ऐवेलूशन कहा वो एक महान सभ्यता के महान प्रयोग का हिस्सा था वो एक समझदार जीव उत्पन्न करना चाहते  थे और जिसमे वो सफल भी हुए एक ऐसा जीव जो अपने मस्तिष्क का बेहतर इस्तमाल कर सके कुछ वैसा ही जैसा हम इंसान आज आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से युक्त रोबोट बनाने का प्रयास कर रहे है मगर वो सभ्यता हमसे कही जयदा विकसित थी इसका प्रमाण हमे कई प्राचीन इमारतों से पता चलता है जैसे ग़िज़ा के पिरमिन्ड , भारत का कैलाश मंदिर ये ऐसे अद्भुत उद्धरण है जिन्हे शायद आज की उन्ननत तकनीक से भी हूबहू फिर से बनाने का प्रयास किया जाये तो सैकड़ो साल लग जायेगे अब एक विचार मन में आता है के वो कौन थे जिन्होंने ऐसा किया वो कहा से आये थे अब कहा है और अब आकर कुछ नया निर्माण क्यों नहीं करते , जब हम इन सवालो का जवाब ढूढ़ने का प्रयास करते है तो एक विचार मन में आता है के कही कोई ऐसी दुनिया हो जो किसी कारण से नष्ट होने की कगार पर हो और वहाँ के समझदार जीव अपने नष्ट होने से पहले एक नयी दुनिया बसा कर गए हो , शायद हो सकता है के वो मंगल ग्रह से हो क्योकि आज के वैज्ञानिक भी इस बात की सम्भावना को मानते है के कभी मंगल में भी जीवन था। 
तो हो सकता है मंगल ग्रह से आये कुछ लोगों ने धरती को इसके लिए चुना हो और यहाँ के वातावरण के हिसाब से जीवन में परिवर्तन किया हो और उस  जीवन के विकास के क्रम को दशावतार का नाम दिया गया हो।  अब हम आते है अपनी पुरानी बात पर के वैज्ञानिक  एक खोज ये मानती है के इंसान का डीएनए बन्दर से काफी हद तक मेल खाता है तो वो कैसे हो सकता है , उन विकसित जीवों ने धरती पर कई जीव बनने के बाद उनमें से अपने कार्य योग्य उचित जीव का चुनाव किया और उसमे अपना डीएनए मिला दिया ये एक एक्सट्रीम जेनेटिक इंजीनियरिंग बेहतरीन उद्धरण है जिसका परिणाम हम इंसान है और वो हमे वेद, विमान शास्त्र, वैशेषिक सूत्र  और अन्य कई ग्रंथों में ज्ञान और विज्ञान के अनेक रहस्यों को भी हमे समझने का प्रयास कर गए , साथ ही अपनी यादो के रूप में कुछ इमारतों को भी बना गये। अब सवाल आता है के आखिर क्यों कोई हमारे लिए इतना सब कुछ करेगा , और वो खुद यहाँ क्यों नहीं रहे ? वो यहाँ इसलिए नहीं रहे क्योकि यहाँ का का वातावरण उनके जीवन के अनुकूल नहीं था और किसी ग्रह का वातावरण परिवर्तित करना नया वातावरण बनाना वो भी व्यापक स्तर पर पुरे एक ग्रह के लिए एक काफी खर्चीला और समय को लेने वाला कार्य है  जबकि जेनेटिक रिसर्च के लिए प्रयोगशाला भी काफी है, आज भी वैज्ञानिक ऐसे कार्य कर लेते है. अब सवाल आता है के उन्होंने ऐसा क्यों किया हमारे लिये , इसका जवाब आप खुद देंगे क्यों आप अपने बच्चो के लिए इतना सब कुछ करते है ,क्यों आप उनके लिए ज्ञान, विज्ञान, सुख सुविधा जुटाते  है क्यों ? तो जवाब है क्योकि उनमे आपका डीएनए है मानव सभ्यता आज भी डीएनए को ट्रांसफर और संरक्षित ही तो कर रही है उसी डीएनए ट्रांसफर को हम पीढ़ियों का आगे बढ़ना कहते है हम उन्ही परग्रही जीवो की ही पीढ़ी है हम उनके डीएनए को आगे बड़ा रहे है उन्होंने हमे अपने डीएनए से एक खास चीज जिसने हमे बन्दर से इंसान बनाया वो है ज्ञान , इसे आप इनफार्मेशन / सुचना कह सकते है डीएनए में एक बहुत बड़ी ताकत है इस पृथ्वी की सारी ज्ञात सूचना जो दुनियाँ भर के कंप्यूटर में समाहित है उसे बस कुछ डीएनए में स्टोर किया जा सकता है और डीएनए पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को संचारित कर सकता है तो हम जब चाहे अपने पूर्वजो के ज्ञान को अपने डीएनए से प्राप्त कर सकते है। 
-AC 

पुण्य कर्म

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan


गोपाल अपनी पत्नी सरला के साथ एक छोटे से गॉव में रहकर अपनी 7  बीघा  जमीन में खेती बड़ी कर जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर रहा था , इस खेती में साल भर के खाने के लिए अनाज निकाल कर थोड़ा बहुत वो मंडी में बेच देता है जिससे साल भर के गुजारे के लिए कुछ पैसे आ जाते , मगर आज कल मंडियों में भी बिचोलियो का इतना बोल बाला हो गया के उन्हें कुछ दिए बिना एक छोटे किसान  के लिए अपना अनाज बेच पाना मुश्किल हो जाता है गोपाल भी कई दिनों से मंडियों के चक्कर काट कर खली हाथ घर आ रहा था। 
आज भी  गोपाल जैसे ही घर के आंगन में पैर रखता है उसकी पत्नी सरला उत्सुकता से पूछती है - " जी आज कुछ बात बनी  क्या ?"

गोपाल भी हाँ  में सिर हिलाते हुए पैसे सरला के हाथ में रखते हुए बोलता है - "बस दाम थोड़े कम मिले है, मगर ईश्वर की कृपा से गुजरा हो जायेगा। "

"आप पहले बच्चो की वर्दी का नाप दे आओ और नया बस्ता दिला लाओ स्कूल में मास्टर रोज टोकता  है इन्हे " - सरला ने कहा 

गोपाल भी लोटे के पानी से मुँह धोते हुए - " ठीक है आज शाम को दिला लाऊगा , तू भी अपने लिए एक साड़ी लेती आना तेरी बहन के यहाँ भी तो लड़के  की शादी  है ,वहाँ ऐसे जाएगी क्या "

" अरे नहीं मै तो शीला बहन जी की साड़ी मांग लुँगी एक दिन की ही तो बात है , आप अपना कुर्ता  सिलवा  लेना फटा पड़ा है सारा , आपको तो बारात में जाना है वो पहन के जाओगे क्या " - सरला ने कहा
 
" चल देखते है , तू पहले रोटी लगा दे बहुत जोरो की भूख लगी है "- और गोपाल हाथ पैर  धोकर खाने के लिए बैठा जाता है
 
सरला , गोपाल को रोटी देती है और गोपाल रोटी खाकर थोड़ा आराम करने के लिए चारपाई पर बैठता ही है के तभी फूलसिंह , जो खेतो में मजदूरी का काम करता है आ जाता  है वो गोपाल के यहाँ भी कभी कभी फसल के समय मजदूरी किया करता  था।  गोपाल स्वभाव का बहुत अच्छा इंसान था ,वो सबके साथ अच्छा व्यवहार करता , न तो जात पात  का भेदभाव करता ना  बड़े छोटे का , और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबकी सहयता भी कर दिया करता , सबसे अच्छी बात उसकी ये थी की जब वो किसी की सहयता करता , ना  तो कभी किसी को एहसान दिखता और ना  ही कभी उसका ढिंढोरा पीटता , वो हमेशा यही कहता की अगर हम किसी के जरूरत के समय काम आ पाए तो ये ईश्वर की हम पर कृपा है , उसके इसी सरल स्वभाव के कारण लोग अक्सर बिना संकोच के उसके पास आ जाया  करते।  

राम राम प्रधान जी  ( गॉव में जिसके पास जमीन  हो उसे उसके यहाँ मजदूरी करने वाले लोग अक्सर इसी तरह सम्बोधित करते थे ) - फूल सिंह ने घर में  घुसते  हुए कहा 

गोपाल  भी बड़ी विनम्रता और सम्मान के साथ जवाब देता - "राम राम फुल्लू भाई आ जा बैठ जा , कैसे आना हुआ। "

" बस प्रधान  जी क्या बताऊ छोटी सी मदद चाहिए आपका एहसान होगा बहुत " - फूल सिंह  ने कहा 

गोपाल ने भी प्रेम पूर्वक कहाँ  - इसमें एहसान की क्या बात है, बता क्या बात हुई, जो बन पड़ेगा करेंगे "

फूलसिंह  बोला - "कल लड़की के रिश्ते वाले आ रहे है , कही कुछ इंतजाम  नहीं हुआ बस आपसे ही उम्मीद है नहीं तो कल लड़के वालो के सामने बात बिगड़ जाएगी "

गोपाल ने सरला की और देखा और धीरे से कहा-  "जा दो -तीन सौ रुपये ला दे इनका काम हो जायेगा "

सरला अंदर से तो गुस्सा होती है पर फूल सिंह के सामने बिल्कुल जाहिर नहीं करती और चुपचाप तीन सौ  रूपये ला कर गोपाल के हाथ  में रख देती ही  गोपाल वो फूल सिंह को देते हुए - " ले भाई , संभाल के रखना , और मेहमानो के लिए  एक दो मिठाई भी ले आना "

फूल सिंह पैसे जेब में रखता है और खुश होकर हाथ जोड़ते हुए - " प्रधान जी जैसे ही कही काम लगता है पहले आपके पैसे लौटाऊंगा आपने मेरी नाक कटने से बचा ली "

"कोई बात नही  भाई इंसान ही इंसान के काम आता है" - गोपाल ने कहा 

फूल सिंह अपने घर की और चल जाता है और गोपाल जैसे ही चारपाई पर पैर फ़ैलाने की कोशिश करता है सरला बहार आती है वो अभी तक तो फूल सिंह की वजह से चुप थी  मगर अब थोड़ा नारजगी के  के भाव से बोलती  है - " सारी  दुनिया का ठेका आपने ही लिया हुआ है"

गोपाल शांत भाव से  - " किसी गरीब का काम हो गया बस और क्या बेचारा बड़ी उम्मीद से आया था।  ईश्वर ने उसी के नाम के दिए होंगे "

"अब बारात में जाना वो ही फटा कुर्ता पहन के,  क्या सोचगे वहाँ  लोग कैसे घर में बिहाई है सरला भी "- सरला ने गुस्से में कहा 

गोपाल ने समझते हुए - " अरे तू तो यु ही परेशान होती है ,जैकेट तो सही है वहाँ कोई मेरी जैकेट उतार कर देखेगा क्या  की कुर्ता फटा है या सही। "

सरला मुँह बनाकर - " आपका तो बस यही है , जैसे कोई और भी आपके बारे में सोचने आ रहा है। "

और सरला बड़ बड़ करते हुए अंदर कमरे में चली जाती है और गोपाल भी चारपाई पर लेट जाता है।  उनका तो ये रोज काम है , सरला हमेशा  गोपाल को समझती के लोगो की मदद से पहले अपना और अपने बच्चो का भी कुछ सोच लिया करो और गोपाल था की कभी अपने बारे में सोचता ही नहीं उसके सामने अगर कोई मदद के लिए आ जाये तो वो हर सम्भव प्रयास करता उसकी मदद का , वो तो यहाँ तक करता की एक बार गोपाल खाना थाली में लेकर बैठा ही था   और घर के दरवाजे पर एक साधु  मांगने आगया तो उसने उस भूखे साधु को अपनी थाली ही पकड़ा दी। दोनों की शादी को 15 साल हो गए थे और उनका जीवन बस ऐसे ही नौक झोक में चल रहा था बच्चे अभी छोटे थे पास के स्कूल में जाते थे बेटी 12 साल की सातवीं कक्षा में पढ़ती और बेटा  9 साल का था और अभी चौथी  में था। जिंदगी की गाड़ी बस धीरे धीरे खिसक रही थी।  परिवार में सबके जीवन में अपार  संतोष के कारण तकलीफ जायदा नहीं होती थी। गोपाल सुबह ही खेत में जाता और अपनी गाय  के लिए घास लाता और सरला उसका घर के काम में हाथ बटाती , खेत का काम गोपाल करता और घर पर गाय  का घास , पानी , दूध का काम दोनों मिलकर करते सब ठीक ही चल रहा था के अचानक खेत में काम करके जब गोपाल घर लौटा तो अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गयी सरला दौड़ कर एक रिक्शा वाले को बुला कर लायी और उसे सरकारी अस्पताल ले गयी। डॉक्टर ने उसकी जांच करी और उसे अस्पताल में ही भर्ती कर लिया रात में सरला को भी उसके पास ही रुकना पड़ा। आने से पहले सरला बेटी को समझा कर आयी थी के घर पर भाई का भी ध्यान रखना और आने में देरी हो जाये तो रसोई घर में रोटी रक्खी है दोनों खा लेना।  मगर उसे कहा पता था के रात रुकना पड़ेगा। सरला रात भर परेशान थी साथ ही उसे ये भी चिंता थी के उनकी अनुपस्थति में गाय का घास पानी कौन करेगा और दूध कौन निकलेगा।  साथ ही रात भर बच्चे अकेले कैसे रहेंगे। रात बहार सरला के दिमाग में यही घूमता रहा।  सुबह जब गोपाल को थोड़ा आराम हुआ तो डॉक्टर ने घर जाने की इज्जाजत तो दी मगर दो चार दिन घर पर आराम करने की सलाह भी दी। रिक्शा कर के जैसे ही घर पहुंची तो उसने देखा के पड़ोस की एक बूढी अम्मा बच्चो के पास बैठी थी और बच्चो को नाश्ता करा रही थी। 

अम्मा को वह बच्चों के साथ देखकर संतोष के भाव के साथ सरला ने कहा - " ताई आप कब आयी यहाँ "

बूढी अम्मा ने कहाँ - "बेटा  में तो कल शाम से यही हु , जब तुजे गोपाल के साथ रिक्शा में जाते देखा तो मुझे कुछ गड़बड़ लगी तो मैं  दौड़कर घर आयी तो बच्चो ने बताया के गोपाल को तू अस्पताल ले कर गयी है , तो मैंने सोचा बच्चे अकेले है तो मै यही रुक गयी  , गोपाल कैसा है अब "

सरला ने चैन की साँस ली और कहा - " ये तो अब ठीक है बस डॉक्टर ने 2 -4 दिन  आराम करने को बोलै है "

" ताई आपका बड़ा अहसान रहेगा हम पर आपने  बच्चो का ध्यान रक्खा मुझे तो रात भर चिंता रही " -सरला ने कृतज्ञता के भाव से कहा 

" अरे बेटा इसमें एहसान कैसा, इंसान ही तो इंसान के काम आता है, जब तेरे ताऊ बीमार हुए तो गोपाल ही तो उन्हें डॉक्टर के ले गया था और दो दिन वही रहा था अस्पताल में  वर्ना  मैं  बुढ़िया कहा जाती " - बूढ़ी अम्मा ने जवाब दिया 

सरला बच्चो की चिंता से मुक्त होकर , बैठती ही है के तभी पड़ोस की विमला चाची हाथ में दूध के बाल्टी लेकर अन्दर आती है और बोलती है - आ गयी सरला , गोपाल ठीक है अब "

सरला हां में गर्दन हिला देती है 

विमला दूध की बाल्टी रखते हुए बोलती है - "ले तेरी गाय का दूध निकाल  दिया और घास पानी सब हो गया , शाम को एक बार फिर चक्कर लगा दूगी और हाँ  शाम का दूध तेरी रसोई घर में रखा है एक बार फिर उबाल लेना जो बचा होगा "

" चाची आपकी बहुत मेहरबानी ,आप ना आते तो गाय रात भर ऐसे ही खड़ी  रहती " - सरला ने कहा 

"अरी सरला कैसी बात करती है तू भी , इंसान ही तो इंसान के काम आवे है, एहसान तो गोपाल का है हम पर जब मेरी बड़ी बेटी कुसुम की शादी  हुई तो बारात दरवाजे पर आने को थी और खाने का कोई इंतजाम ना था तब गोपाल ने ही चावल का कट्टा लाकर दिया अपने घर से तब जाकर बारात के लिए दाल भात का इंतजाम हुआ था "- बिमला चाची  ने कहा 

बिमला चाची की बात सुनकर सरला गोपाल के मुँह की तरफ देख उनके नेक कर्मो को सोच  ही रही थी के तभी फूलसिंह आवाज़ लगता है - " प्रधान जी प्रधान जी क्या  हो गया "

गोपाल धीमी आवाज में -"बस कुछ नहीं फुल्लू भाई कल जरा से चक्कर  आ गए थे "

"क्या कहा डॉक्टर ने " - फूलसिंह ने पूछा 

" 2 -4  दिन आराम करने के लिए बोला है डॉक्टर ने इन्हे " - सरला ने जवाब दिया 

" ध्यान रखना प्रधान जी ,और किसी काम धाम की चिंता मत करना घास मैं रोज ला दुगा खेत से और गाय  को भी डाल जाया करूंगा "

सरला की तो जैसे सारी  चिंता ही दूर हो गयी थोड़ी  देर बैठ कर सभी अपने अपने घर चले गए मगर सरला चुप चाप बैठी गोपाल की और देख रही थी, गोपाल धीरे से पूछता है - " अब तू क्या सोच रही है किस चिंता में डूबी है "

"अब काहे की चिंता सारा काम तो तो आपने पहले ही निपटा दिया , आप सच ही कहते थे इंसान ही इंसान के काम आता है , आपके पुण्य कर्मो ने ही आज मुसीबत के समय हमारी सारी  चिंता दूर कर दी " - सरला आँखों से ख़ुशी के आंसू पोछते हुए।  दोनों बच्चे अपनी माँ के गले लगकर बैठ जाते है , और सभी मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद करते है और चैन की साँस लेकर सरला भी पीछे कमर की टेक लगाकर आराम करने लगती है। 

-AC

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नालायक बेटा

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan

85 साल के मास्टर गिरधारीलाल खटिया पर बीमार पड़े थे।  मास्टर जी बहुत मिलनसार स्वाभाव के थे और व्यवहार में बहुत अच्छे थे तो उनकी बीमारी की  सुचना से दूर - दूर से लोग उनका हालचाल जानने आ रहे थे। और अपने स्वभाव के अनुसार ही गिरधारीलाल भी सबकी आवभगत का प्रयास करते और जब भी कोई आता तो अपने छोटे बेटे अजय को आवाज़ लगाते  और अजय भी तुरन्त दौड़कर चाय पानी की वयवस्था करता और जब तक आगंतुक चाय पीते  मास्टर जी अपने किस्से सुनाते और सबके सामने अपने बेटे अजय की तारीफ करने का कोई मौका न छोड़ते।  
एक दिन  मास्टर जी के एक पुराने जानकर साथी मास्टर रामपाल जो उनके साथ ही विद्यालय में शिक्षक थे कहते है गिरधारी भाई आप तो कहते थे आपका छोटा बेटा अजय एकदम नालायक है कुछ नहीं करता आज आप उसकी  तारीफों के पुल बांध रहे है। 

गिरधारीलाल  मुस्कराते हुए "रामु भाई कभी कभी सच वो नहीं होता जो हमें दिखाई देता है। "

और गिरधारीलाल की आँखों के सामने पुरानी बातें फिर से जीवंत हो उठती है दरअसल गिरधारीलाल के तीन  बेटे और एक बेटी है  बड़ा बेटा रविंदर , मझला विजय और छोटा अजय और बेटी शीला अजय चारो में सबसे छोटा है।  चारो बच्चे पढ़ाई लिखाई में एक से बढ़ कर एक, आख़िर गिरधारीलाल जी  मास्टर जो  थे , तो अपने बच्चो की पढ़ाई का बहुत ध्यान रखते और हमेशा बच्चो को समझाते के तुम्हे पढ़ लिखकर बड़ा अफसर बनना है।  बड़े पद पर पहुँचो मान, प्रतिष्ठा प्राप्त करो और चारो बच्चे खूब पढ़ाई लिखाई करते एक एक कर सभी ने बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके उच्च शिक्षा के लिए बहार गए,  बड़े बेटे ने MBBS पास किया और बड़े मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर  बन गया , मझला बेटा IIT से इंजीनियरिंग कर विदेश में बड़ी नौकरी पर चला गया , बेटी ने सनातक के बाद सिविल परीक्षा  उत्तीर्ण की और वो भी विदेश सेवा में चली गयी। मगर न जाने क्या हुआ के छोटे बेटे  अजय ने ही मेधावी होने के बाद भी आगे पढ़ने से मना कर दिया और घर के पास एक छोटी सी दुकान कर ली और खेती बाड़ी का काम करने लगा।  बस यही बात थी जो गिरधारीलाल जी को अच्छी न लगी और वो अपने छोटे बेटे अजय से नाराज रहने लगे और सब जगह अपने तीनों बच्चो की खूब तारीफ किया करते और जब भी अजय का जिक्र आता तो यही कहते वो तो एक नंबर का नालायक है किसी काम का नहीं और घर पर भी दिन भर उसे कोसते रहते और रिटायरमेंट के बाद तो जब वो घर पर ही रहने लगे तो ये सिलसिला इतना बढ़ गया के अजय का नाम ही नालायक पड़ गया जब भी कोई काम हो गिरधारी लाल जी यही कहते ए  नालायक इधर सुन, जा जाकर बिजली का बिल जमा करा दे ,जा बाजार से सामान ले आ , और अजय हर बार मुस्कुराते हुए जी बाबू जी कह कर काम में लग जाता।  अजय की बीवी भी बहुत सुशिल थी वो भी दिन रात  माँ और बाबू जी की सेवा में लगी रहती।  

"अरे गिरधारीलाल जी कहाँ  खो गये" - रामपाल जी ने मास्टर जी को हिलाते हुए तेजी से आवाज़ लगायी 

गिरधारीलाल ने जवाब दिया  -" बस कही नहीं, यही था भाई"

गहरी चैन की साँस लेते हुए गिरधारी लाल जी फिर बोले - " रामु भाई पता है 3 साल पहले गुजरने से पहले तेरी भाभी ने मुझे एक डायरी दिखाई जानता है वो डायरी किसकी थी ?"

"किसकी डायरी कैसी डायरी" रामपाल ने आश्चर्य से पूछा 

गिरधारीलाल ने फिर अपने मित्र रामपाल को सारी घटना बताई के गिरधारीलाल  की पत्नी ने उसे अजय की एक डायरी दिखाई जिसके बारे में सिर्फ अजय और उसकी माँ को पता था जिसमे एक जगह अजय ने एक घटना लिखी की कैसे बचपन में  पड़ोस के चाचा  के देहात पर उनके बच्चे जो विदेश में बड़ी नौकरी करते थे, नहीं आ सके और वो चाचा अपने आखरी दिनों में अपनी बीमारी से अकेले ही लड़ते रहे , न तो कोई उनके साथ घर का देख-भाल के लिए था, न कोई पानी पूछने वाला। कभी - कभार कोई पड़ोस का थोड़ा बहुत देर के लिए आ जाये तो अलग बात , धन ,दौलत , रुपये पैसे की चाचा के पास कोई कमी ना थी , कमी थी तो बस दुःख और सुख को बाटने वालो की , उनके बच्चे भी रुपया पैसा तो खूब भेजते मगर अपने बड़े काम धंदो की व्यस्तता में मिलने आने का समय ही ना निकाल पाते  . और चाचा बस एक ही बात कहते " शायद मेरी ही गलती है की  मैंने अपने बच्चो को हमेशा पैसे के पीछे दौड़ना ही सिखाया और  पैसे को इतना बड़ा और जरुरी बना दिया के आज वो उनके लिए माँ बाप से भी बड़ा हो गया। "

उसी डायरी में अजय ने एक जगह अपने आगे पढ़ाई न करने का भी कारण लिखा उसमे लिखा था " अगर मैं ज्यादा  बड़ी पढ़ाई करुगा तो बहार जाकर नौकरी करनी पड़ेगी और घर और माँ बाप को छोड़ कर दूर रहना पड़ेगा।  अगर माँ , बाबू जी को साथ शहर ले जाने की भी सोचु तो , वो वहाँ खुश नहीं रह पाएंगे क्योकि उनकी जड़े  गांव में इतनी गहरी बस चुकी है अगर कही और ले जाया गया तो सुख जायेगे और मै कुछ ज्यादा पैसे कमाने के लिए उनकी ख़ुशी दाव पर कैसे लगाऊ "

और वो आगे लिखता है " और मेरे लिए भी पैसा, पद, प्रतिष्ठा से ज्यादा जरुरी मेरे माँ - बाबू जी का साथ और  सेवा है और वही मेरी असली ख़ुशी "

ये बाते  बताते हुए गिरधारी लाल जी का गाला हल्का सा भर आया और उन्होंने कहा " बस रामपाल भाई उस दिन से मेरा उसके प्रति नजरिया बदल गया "

रामपाल  , गिरधारी लाल जी के कंधे पर हाथ  रखते हुए बोले - " गिरधारी लाल जी आखिर बेटा  तो आपका ही है , आपके ही संस्कार तो आएंगे अपने भी तो उस ज़माने में एमएससी  होने के बावजूद यहाँ गॉव के पास प्राइमरी स्कूल चुना जबकि आप भी तो शहर जाकर किसी बड़े कॉलेज मे प्रोफ़ेसर बन सकते थे।  "

दोनों के चेहरे पर  एक मुस्कुराहट आ जाती है 

तभी रामपाल जी पूछते है - " कहाँ है तुम्हारे अजय बाबू "

और सामने से आते अजय की तरफ इशारा करके गिरधारी लाल जी  - " लो आ गया नालायक "
और दोनों जोर जोर से हंसने लगते है.

-AC

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मैं किसान हू कोई मेरी भी सुनो

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan


किसान के लिए लड़ कौन रहा है किसान तो बस मोहरा है इस रजनीतिक लड़ाई का और पीसना भी उसी को है इस लड़ाई में 
ना तो सरकार ने कानून बनाने से पहले किसान  के हर हित का सोचा, ना आज उसकी लड़ाई लड़ने का ढोंग करने  वाले सोच रहे है।
कानून में खामिया है वो तो सविधान में भी थी उसे तो हमने रद्द नही किया समय समय पर जरूरत के हिसाब से उसमे संशोधन किये। अगर ये नेता भी किसान के सच्चे हितेषी होते तो ये इस बात पर चर्चा करते के कानून में क्या होना चाहिये या क्या नही होना चाहिये जो कमियां है उस पर बात करते , मगर मकसद तो बस राजनीतिक रोटियां है।
और इन राजनीतिक गिद्दों का मंडराना भी दिखा रहा है के ये माहौल खराब कर अपनी रोटियां सेंकने के लिए मंडरा रहे हैं।
आज अगर कानून ज्यो का त्यों रहता है या रद्द हो जाता है दोनों परिस्थितियों में नुकसान तो किसान का ही है। वो किसान जिसका घर ही खेती से चलता है खेती जिसकी रोजी रोटी है। 
उनका क्या बिगड़ेगा जिनकी रोटी उनकी राजनीति की दुकान से आती है।
इससे बड़े दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है के लोगो मुद्दों का विरोध और समर्थन भी ये देखकर करते है के कौनसी पार्टी पक्ष में है कौन इसके विपक्ष में। लोगो को मुद्दों से कोई मतलब नही , सिर्फ अपने नेताओं की गुलामी करनी है। गुलामी का स्तर ये है के एक किसान को आतंकवादी कहने से और गालिया देने से भी नही चूक रहा और दूसरा मुद्दों से भटके एक राजनीतिक आंदोलन का समर्थन कर रहा है क्योंकि दोनों के आकाओ का यही आदेश है।
और किसानों के नाम पर छिड़ी इस जंग में पीस किसान रहा है।मगर क्या फर्क पड़ता है वो तो सदियों से ये झेलता आया है वो तो हर साल अपनी फसल को लेकर मंडियों के चक्कर लगाता है और बिचौलियों की मिन्नते करता है, वो तो हर साल अपने गन्ने के पेमेंट का इंतजार करता है, वो बिचौलियों द्वारा उसकी पर्ची कटवा देने पर उसी को अपना गन्ना आधा पौन दाम में देकर आता है। वो अनाज की लागत भी वसूल न होने पर भी उसे बेचने पर मजबूर होता है और फिर भूख से लड़ता अगली फसल का इंतजार करता है। वो कभी चिलमिलती धूप में पसीना बहता है तो कभी कड़कती सर्दी में आधी रात खेत मे बारी का इंतजार कर पानी देकर आता है।
वो देखता है उन राजनेताओं को जो उसके नाम पर राजनीति करते है और महलो में रहकर शकुन की जिंदगी बिताते हैं।
और वो दिन रात एक करके भी रूखी सुखी खाकर मुश्किल से अपने बच्चो को पढ़ाता और अपने घर को पक्का कर पाता है।
डॉक्टर अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है, नेता बच्चे को नेता , अभिनेता बच्चे को अभिनेता, किसान नेता के बच्चे किसान नेता बनते है पर जिस किसान के इस देश मे इतने चर्चे है  वो नही चाहता के उसके बच्चे किसान बने । 
क्योकि उसका दर्द ना तों कोई देख सकता है ना ही कोई समझ सकता है, 
जय जवान जय किसान का नारा भी सिर्फ भाषणों तक ही सीमित है क्योंकि किसान को ना तो वो सुविधा मिलती है ना ही सम्मान।
खेत मे काम करते सिर्फ उसके हाथों की रेखाये ही नही मिटती उसकी किस्मत की रेखाये भी मिट जाती है। उसके पैरों की दरारे कब सूखती जमीन से भी गहरी हो जाती है वो खुद भी समझ नही पता।
और आज जब वो देश की इन परिस्थितियों को देखता होगा तो सोचता तो होगा क्यो ये लड़ाई सिर्फ उसके नाम पर है उसके लिये नही?
-AC

अयोध्या का फैसला

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan
ये कहानी है अयोध्या के फैसले की आज अयोध्या में भगवान राम का मन्दिर भी जल्द बन जायेगा मगर ये कहानी है तब की जब फैसला अदालत में था।
आज अयोध्या पर फैसला उच्चतम न्यायलय के समक्ष है कभी इसी अयोध्या नगरी के समक्ष सती नारी सीता का फैसला था। कहा जाता है के अग्नि में तप कर सोना कुन्दन  बन जाता है लेकिन तब नारी अग्नि परीक्षा देकर भी अपने सतित्व का प्रमाण नहीं दे पायी। 
जिन राम के मन्दिर के लिए आज मामला न्यायाधीश के समक्ष है तब वो राम स्वयं न्यायाधीश होकर भी न्याय ना कर सके। मगर शायद वो निर्णय ना तो उस राजा के लिए आसान रहा होगा ना ही उस पति के लिए। वो निर्णय उस न्यायशील राजा का न्याय था या उनके द्वारा भूल वश किया गया अन्याय। 
आज कलयुग में भी न्यायालय साक्ष्य , गवाह मांगता है बड़े से बड़े दोषी को भी अपना पक्ष रखने का अवसर देता है परन्तु तब न तो किसी ने उस नारी का पक्ष सुना और साथ ही उस नारी के सभी साक्ष्यों को भी नज़रअंदाज़ किया गया। एक आक्षेप जनमत पर भारी क्यों था सवाल आसान है परन्तु निर्णय आसान न था। 
सवाल जितना सरल दिखता है निर्णय उतना ही जटिल था वो तब  भी उतना ही जटिल था और आज भी। क्योकि बात सिर्फ एक निर्णय की नही थी जो कुछ साक्ष्यों के आधार पर ले लिया जाए बात उस परम्परा की थी जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करें।
राम ने अपना राजधर्म निभाया सीता ने पतिव्रत धर्म और लव कुश ने अयोध्या नगरी में न्याय की याचना कर अपना पुत्रवत धर्म और आज फैसला करना था अयोध्या को।
मगर फैसला तो तब भी अयोध्या ने ही किया था जिसने राजा राम को ऐसा निर्णय करने पर विवश किया जिसने न सिर्फ राम को उनकी अर्धागिनी से अलग किया बल्कि एक पतिव्रता, देवी स्वरूप नारी को फिर से वनों की ठोकर खाने पर मजबूर कर दिया । हा फिर से क्योकि वो पहले भी तो 14 साल का वनवास काट कर आई थी जो उसके पति को मिला था उसने वनवास में अपने पति का साथ दिया मगर आज पति ने उसका साथ क्यो नही दिया ऐसी क्या मजबूरी थी उस पति की ?
यह कहानी किसी साधारण नारी की नही यह तो उस नारी की गाथा है जो एक राजा की पुत्री थी और उसी अयोध्या के राजा की पत्नी मगर कहते है ना एक व्यक्ति राजा बनने के बाद पहले एक राजा होता है फिर पुत्र, पिता या पति । उसके लिए राजधर्म ही सर्वोपरि होता है और होना भी चाहिए क्योकि राजा को तो ईश्वर का रूप माना जाता है और ईश्वर के लिये तो सभी एक समान होते है।इसलिये राजा के लिये भी प्रजा की हर एक आवाज़ महत्वपूर्ण होती है। इसलिये प्रजा में उठी वो आवाज़ उस राजा के लिए भी मत्त्वपूर्ण थी , वो आवाज़ जिसने जिसने उस सती नारी पर मिथ्या दोष मढ़े और उस नारी को वन में बेसहारा छोड़ने का दंड मिला। हाँ दण्ड ही तो था क्योंकि न्याय तो किसी के साथ हुआ ही नही ना उस नारी के साथ ना उसके पति के साथ।
आज उसका पति , राजसिंहासन पर अपने राजधर्म का पालन कर रहा है और वो नारी राजाज्ञा और पत्नीव्रत धर्म का। वो चहती तो इस अन्याय का विरोध कर सकती थी, वो चाहती तो उस नगरी और पति को छोड़ अपने पिता के घर भी जा सकती थी परन्तु उसके लिए अपने सुखों से ज्यादा पति का सम्मान महत्वपूर्ण था। इसलिये वो वन को चली गयी सब अपनो से मुख मोड़कर सब रिश्तों को तोड़ कर।
उस वन में उस नारी को आश्रय दिया एक महऋषि ने मगर वो नारी वहाँ भी बिना किसी पर आश्रित हुए स्वयं का जीवनयापन करती है अपने दो पुत्रों को जाम दे उनका लालन पालन कर उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाती है।
और एक दिन वो बालक अपनी माता की कथा जान पहुच जाते है उसी अयोध्या नगरी की गलियों में , उस नारी को न्याय दिलाने के लिये। और नियति का पहिया फिर ले आता है उस नारी को अयोध्या में उसी राजा, न्यायाधीश के समक्ष और फिर न्याय करना है उस अयोध्या को और एक बार फिर आना है अयोध्या का फैसला।
मगर क्या अर्थ है उस न्याय का , क्या अर्थ है उस फैसले का , राजा का धर्म है वो प्रजा में विरोध की एक भी आवाज़ को अनसुना ना करे मगर क्या एक आवाज़ के लिये बाकी सभी आवाज़ों को अनसुना कर देना धर्म है? खैर राजा अपना राजधर्म निभा रहा है और उस नारी को फिर से राजदरबार में बुला रहा है। उस नारी का धर्म है के उसके पति की कृति बनी रहे इसलिए वो फिर उस राजदरबार में उपस्थित है। अब फैसला अयोध्या को करना है उस प्रजा को करना है के क्या सही क्या गलत।