Tuesday, October 17, 2017

Importance of festivals

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan
importance of festivals

भारत एक ऐसा देश है जिसे अगर हम  त्यौहार का  देश कहे तो ये अतिशयोक्ति नही होगी। क्योकि यहाँ हर दिन कही ना कही, कोई न कोई त्योहार होता ही है जीवन की व्यस्तता के कारण हम मनोरंजन और खुशियो के लिये भी समय नही निकाल पाते। ये त्यौहार हमारे जीवन मे सुखद परिवर्तन लाते है तथा हमारे जीवन में हर्षोल्लास और नवीनता का संचार करते है। हर त्यौहार में कुछ परम्पराए और कुछ समाजिक मान्यताए होती है । हर समुदाय, जाति और धर्म की अपनी मान्यताए होती है उसी के आधार पर वो अपने त्योहारों को मानते है। इन त्यौहारों में परम्परा और मान्यता के साथ समाज और देश के लिये कोई न कोई संदेश भी होता है और यही इनकी सबसे बड़ी खूबसूरती होती है। जैसे भारत मे विजयदशमी को असत्य पर सत्य की जीत का और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व माना जाता है और यही इसका सामाजिक संदेश है। उसी प्रकार रक्षाबंधन भाई बहन के पवित्र प्रेम और भाई का बहन को आजीवन रक्षा करने का वचन  इसका सामाजिक संदेश है। इसी प्रकार होली हमे एकरूपता और शत्रु से भी प्रेम करने का संदेश देता है।क्रिसमस संसार से पाप और अंधकार को दूर करने का सन्देश देता है। ईद आपसी भाईचारे का संदेश देता है। हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक उद्देश्य होता है। जो उन त्योहारों की वास्तविक सुंदरता है। और ये समाज के ताने बाने को मजबूत करते है।
हर त्यौहार का कुछ न कुछ विधि विधान होता है उनमें काफी वैज्ञनिकता भी है हो सकता है इन्ही वैज्ञनिक महत्व को देखते हुए हमारे पूर्वजों ने त्यौहार और रीतिरिवाजों के द्वारा ये महत्व अपनी अगली पीढ़ी तक पहुचाने का प्रयास किया हो। 
दीपावली से पहले सभी घरों में साफ सफाई और रंगाई पुताई होती है और आज विज्ञान भी इसके महत्व को नकार नही सकता के बरसात के बाद घरों में नमी और गंदगी होती है और गंदगी और मक्खी मच्छर बीमारियो का कारण बन सकते है और दीवाली से पहले की ये सफाई कितनी उपयोगी होती है। 
हर पुजा पाठ में तुलसी को महत्वपूर्ण स्थान मिला है और शास्त्रों में हर घर मे तुलसी का पौधा लगाने के लिए कहा गया है रोज सवेरे तुलसी को जल देना और पूजा अर्चना करने का विधान है और वैज्ञनिक शोधों में पाया गया है कि मानव शरीर के लिए तुलसी का पौधा अनेक प्रकार से लाभदायक है। यह हवा को शुद्ध करने में सहायक है और अनेक रोगों में भी इसके पत्ते, इसके बीज लाभकारी सिद्ध होते हैं। आयुर्वेदिक डॉक्टर भी तुलसी को जड़ी बूटी मानकर दवाओं में प्रयोग करते हैं। 
साथ ही प्रतिदिन सवेरे सूर्य को जल अर्पित करने को हमारे धर्म ग्रंथों में महत्वपूर्ण बताया गया है। सूर्योदय के समय जो किरणें हमारे शरीर पर पड़ती हैं वह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं। इसलिए हमारे पूर्वजों ने रोज सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर सूर्योदय के समय में जल अर्पण करने का प्रावधान किया है।
ऐसे ही विभिन्न त्यौहारों पर उपवास का महत्व है यदि हम उपवासों पर दृष्टि डालें तो उपवासों का उद्देश्य मानव शरीर को स्वस्थ रखना प्रतीत होता है सारी शारीरिक समस्याओं की जड़ पेट होता है अर्थात यदि पेट की पाचन क्रिया दुरुस्त है तो शरीर व्याधि रहित रहता है। उसे ठीक रखने के लिए समय-समय पर उपवास करना सर्वोत्तम माना गया है, फिर चाहे उपवास रोजे के रूप में हो या फिर नवरात्री के रूप में। अगर हम नवरात्रो के उपवास के समय पर गौर करे तो पता चलेगा के ये मौसम परिवर्तन के समय आते है जिसमे एक शर्दियों के आगमन पर और एक गर्मियों के आगमन पर जो हमारे पेट को उपवास के माध्य्म से उस ऋतु परिवर्तन के अनुकूल बनाते है।
पूजा पाठ के दौरान होने वाले हवन का भी विशेष महत्व है वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हो चुके हैं के जब हवन का आयोजन होता है तो उसमें हवन कुंड में देसी घी, कपूर, हवन सामग्री तथा आम की लकड़ी प्रज्वलित की जाती है। इन वस्तुओं के प्रज्वलन से शुद्ध ऑक्सिजन  प्राप्त होती है, जो हमारे स्वास्थ्य रक्षा और रोगों के निदान के लिए महत्वपूर्ण होता है हवन से वायु शुद्ध होती है इससे वातावरण में व्याप्त जीवाणु और विषाणु नष्ट हो जाते हैं साथ ही हम संक्रमण से बचते हैं। 
पूजा पाठ में वैदिक मन्त्रों का जाप भी महत्वपूर्ण माना गया है मन्त्र का उद्देश्य मन को केंद्रित कर उसे अनेक बुराइयों से बचाना होता है और इससे शारीरिक ऊर्जा का विकास होता है। इस विषय पर शोध करने के पश्चात पाया गया कि मन्त्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें अनुकूल प्रभाव डालती हैं। अतः इस मन्त्र का वैज्ञानिक महत्त्व चमत्कारिक है। इसके लगातार उच्चारण करने से शारीरिक ऊर्जा के साथ-साथ जप के स्थान पर भी ऊर्जा का संचार पाया गया है।
नदियों में सिक्के डालने के पीछे भी रहस्य छिपा हुआ है। प्राचीन काल में सिक्के तांबे के होते थे, जिन्हें नदी में डालने से नदी के जल को शुद्ध करने में सहायता मिलती थी। यद्यपि यह परंपरा आज अप्रासंगिक हो गयी है क्योंकि सिक्के अब तांबे के नही होते तो ऐसी परम्परों को आज त्याग देना चाहिये। और साथ ही अन्य गंदगी भी धर्म के नाम पर नदियों में नही डालनी चाहिए क्योंकि ये धर्म की वैज्ञनिकता को कंलकित करती है।
त्यौहार पारिवारिक और सामाजिक एकता में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं । त्यौहार का आनंद और भी अधिक होता है जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ त्योहारों में हिस्सा लेते हैं । परिवार के सदस्यों का त्योहार के शुभ अवसर पर एकत्र होने से कार्य की व्यस्तता के कारण जो संवादहीनता या परस्पर दुराव उत्पन्न होता है वह समाप्त हो जाता है । संवेदनाओं व परस्पर मेल आदि से मानवीय भावनाएँ पुनर्जीवित हो उठती हैं । इसके अतिरिक्त पारिवारिक संस्कार आदि का बच्चों पर उत्तम प्रभाव पड़ता है ।
अतः हम कह सकते है के ये त्यौहार परिवार , समाज और राष्ट्र के निर्माण और एकता के लिये महत्वपूर्ण है। तो त्योहारों को मिलजुलकर मनाये और खुशियों को बटकर खुशियो को बढ़ाये।

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