Featured post

भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan भारतीय दर्शन विश्व के प्राचीनतम दर्शनो में से एक है इसमें अनेक वैज्ञानिक सिंद्धान्तो को प्रतिपादि...

नालायक बेटा

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan

85 साल के मास्टर गिरधारीलाल खटिया पर बीमार पड़े थे।  मास्टर जी बहुत मिलनसार स्वाभाव के थे और व्यवहार में बहुत अच्छे थे तो उनकी बीमारी की  सुचना से दूर - दूर से लोग उनका हालचाल जानने आ रहे थे। और अपने स्वभाव के अनुसार ही गिरधारीलाल भी सबकी आवभगत का प्रयास करते और जब भी कोई आता तो अपने छोटे बेटे अजय को आवाज़ लगाते  और अजय भी तुरन्त दौड़कर चाय पानी की वयवस्था करता और जब तक आगंतुक चाय पीते  मास्टर जी अपने किस्से सुनाते और सबके सामने अपने बेटे अजय की तारीफ करने का कोई मौका न छोड़ते।  
एक दिन  मास्टर जी के एक पुराने जानकर साथी मास्टर रामपाल जो उनके साथ ही विद्यालय में शिक्षक थे कहते है गिरधारी भाई आप तो कहते थे आपका छोटा बेटा अजय एकदम नालायक है कुछ नहीं करता आज आप उसकी  तारीफों के पुल बांध रहे है। 

गिरधारीलाल  मुस्कराते हुए "रामु भाई कभी कभी सच वो नहीं होता जो हमें दिखाई देता है। "

और गिरधारीलाल की आँखों के सामने पुरानी बातें फिर से जीवंत हो उठती है दरअसल गिरधारीलाल के तीन  बेटे और एक बेटी है  बड़ा बेटा रविंदर , मझला विजय और छोटा अजय और बेटी शीला अजय चारो में सबसे छोटा है।  चारो बच्चे पढ़ाई लिखाई में एक से बढ़ कर एक, आख़िर गिरधारीलाल जी  मास्टर जो  थे , तो अपने बच्चो की पढ़ाई का बहुत ध्यान रखते और हमेशा बच्चो को समझाते के तुम्हे पढ़ लिखकर बड़ा अफसर बनना है।  बड़े पद पर पहुँचो मान, प्रतिष्ठा प्राप्त करो और चारो बच्चे खूब पढ़ाई लिखाई करते एक एक कर सभी ने बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके उच्च शिक्षा के लिए बहार गए,  बड़े बेटे ने MBBS पास किया और बड़े मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर  बन गया , मझला बेटा IIT से इंजीनियरिंग कर विदेश में बड़ी नौकरी पर चला गया , बेटी ने सनातक के बाद सिविल परीक्षा  उत्तीर्ण की और वो भी विदेश सेवा में चली गयी। मगर न जाने क्या हुआ के छोटे बेटे  अजय ने ही मेधावी होने के बाद भी आगे पढ़ने से मना कर दिया और घर के पास एक छोटी सी दुकान कर ली और खेती बाड़ी का काम करने लगा।  बस यही बात थी जो गिरधारीलाल जी को अच्छी न लगी और वो अपने छोटे बेटे अजय से नाराज रहने लगे और सब जगह अपने तीनों बच्चो की खूब तारीफ किया करते और जब भी अजय का जिक्र आता तो यही कहते वो तो एक नंबर का नालायक है किसी काम का नहीं और घर पर भी दिन भर उसे कोसते रहते और रिटायरमेंट के बाद तो जब वो घर पर ही रहने लगे तो ये सिलसिला इतना बढ़ गया के अजय का नाम ही नालायक पड़ गया जब भी कोई काम हो गिरधारी लाल जी यही कहते ए  नालायक इधर सुन, जा जाकर बिजली का बिल जमा करा दे ,जा बाजार से सामान ले आ , और अजय हर बार मुस्कुराते हुए जी बाबू जी कह कर काम में लग जाता।  अजय की बीवी भी बहुत सुशिल थी वो भी दिन रात  माँ और बाबू जी की सेवा में लगी रहती।  

"अरे गिरधारीलाल जी कहाँ  खो गये" - रामपाल जी ने मास्टर जी को हिलाते हुए तेजी से आवाज़ लगायी 

गिरधारीलाल ने जवाब दिया  -" बस कही नहीं, यही था भाई"

गहरी चैन की साँस लेते हुए गिरधारी लाल जी फिर बोले - " रामु भाई पता है 3 साल पहले गुजरने से पहले तेरी भाभी ने मुझे एक डायरी दिखाई जानता है वो डायरी किसकी थी ?"

"किसकी डायरी कैसी डायरी" रामपाल ने आश्चर्य से पूछा 

गिरधारीलाल ने फिर अपने मित्र रामपाल को सारी घटना बताई के गिरधारीलाल  की पत्नी ने उसे अजय की एक डायरी दिखाई जिसके बारे में सिर्फ अजय और उसकी माँ को पता था जिसमे एक जगह अजय ने एक घटना लिखी की कैसे बचपन में  पड़ोस के चाचा  के देहात पर उनके बच्चे जो विदेश में बड़ी नौकरी करते थे, नहीं आ सके और वो चाचा अपने आखरी दिनों में अपनी बीमारी से अकेले ही लड़ते रहे , न तो कोई उनके साथ घर का देख-भाल के लिए था, न कोई पानी पूछने वाला। कभी - कभार कोई पड़ोस का थोड़ा बहुत देर के लिए आ जाये तो अलग बात , धन ,दौलत , रुपये पैसे की चाचा के पास कोई कमी ना थी , कमी थी तो बस दुःख और सुख को बाटने वालो की , उनके बच्चे भी रुपया पैसा तो खूब भेजते मगर अपने बड़े काम धंदो की व्यस्तता में मिलने आने का समय ही ना निकाल पाते  . और चाचा बस एक ही बात कहते " शायद मेरी ही गलती है की  मैंने अपने बच्चो को हमेशा पैसे के पीछे दौड़ना ही सिखाया और  पैसे को इतना बड़ा और जरुरी बना दिया के आज वो उनके लिए माँ बाप से भी बड़ा हो गया। "

उसी डायरी में अजय ने एक जगह अपने आगे पढ़ाई न करने का भी कारण लिखा उसमे लिखा था " अगर मैं ज्यादा  बड़ी पढ़ाई करुगा तो बहार जाकर नौकरी करनी पड़ेगी और घर और माँ बाप को छोड़ कर दूर रहना पड़ेगा।  अगर माँ , बाबू जी को साथ शहर ले जाने की भी सोचु तो , वो वहाँ खुश नहीं रह पाएंगे क्योकि उनकी जड़े  गांव में इतनी गहरी बस चुकी है अगर कही और ले जाया गया तो सुख जायेगे और मै कुछ ज्यादा पैसे कमाने के लिए उनकी ख़ुशी दाव पर कैसे लगाऊ "

और वो आगे लिखता है " और मेरे लिए भी पैसा, पद, प्रतिष्ठा से ज्यादा जरुरी मेरे माँ - बाबू जी का साथ और  सेवा है और वही मेरी असली ख़ुशी "

ये बाते  बताते हुए गिरधारी लाल जी का गाला हल्का सा भर आया और उन्होंने कहा " बस रामपाल भाई उस दिन से मेरा उसके प्रति नजरिया बदल गया "

रामपाल  , गिरधारी लाल जी के कंधे पर हाथ  रखते हुए बोले - " गिरधारी लाल जी आखिर बेटा  तो आपका ही है , आपके ही संस्कार तो आएंगे अपने भी तो उस ज़माने में एमएससी  होने के बावजूद यहाँ गॉव के पास प्राइमरी स्कूल चुना जबकि आप भी तो शहर जाकर किसी बड़े कॉलेज मे प्रोफ़ेसर बन सकते थे।  "

दोनों के चेहरे पर  एक मुस्कुराहट आ जाती है 

तभी रामपाल जी पूछते है - " कहाँ है तुम्हारे अजय बाबू "

और सामने से आते अजय की तरफ इशारा करके गिरधारी लाल जी  - " लो आ गया नालायक "
और दोनों जोर जोर से हंसने लगते है.

-AC

आपको ये कहानी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताएं, अगर अच्छी लगी तो इसे आगे शेयर जरूर करे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें