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भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan भारतीय दर्शन विश्व के प्राचीनतम दर्शनो में से एक है इसमें अनेक वैज्ञानिक सिंद्धान्तो को प्रतिपादि...

शिक्षक एक युग निर्माता

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan


भारतीय संस्कृति में शिक्षक का महत्व बहुत बड़ा माना गया है, जो सच में है भी , क्योकि एक शिक्षक के हाथों में राष्ट्र का भविष्य होता है , उसके विचार ,उसके कार्ये , उसकी शिक्षा लाखो करोड़ो बच्चो के भविष्य बदल सकती है । इसीलिए गुरु को ईश्वर के तुल्य माना गया है। 
"गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर; गुरु साक्षात परम ब्रह्म, तस्माई श्री गुरुवाय नमः"। गुरू को इतनी बड़ी उपाधि देने का सिर्फ एक कारण है कि उसके पास भी ईश्वर की तरह निर्माण, संचालन और विध्वंस सारी शक्तिया होती है उसका दिया ज्ञान उसके शिष्य से कुछ भी करा सकता है ।
गुरु का ज्ञान और प्रेरणा शिष्यों को किसी भी मार्ग पर जाने के लिए प्रेरित कर सकती है। मगर आज के समय मे हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने उद्देश्य से भटक चुकी है , हो सकता है कि इसका कारण देश मे लागू मैकाले की शिक्षा पद्दति हो।
मैकाले की शिक्षा जो अग्रेजो के समय देश मे लागू की गई थी वो आज भी देश मे लागू है उसका उद्देश्य देश मे नौकर पैदा करना था, ऐसे नौकर जो अग्रेजो के लिए नौकरी कर उनकी सेवा करे , उनके आदेशो का पालन करे, बिना कुछ सोचे । इस शिक्षा पद्दति में सिखाया जाता है, क्या और कैसे आज भी हम यही सिख रहे है हमारे बच्चे भी यही सिख रहे है जबकि जीवन मे क्या और कैसे से ज्यादा ये जानना जरूरी है क्यों , जब हमारा सवाल क्यों होता है तो हम समस्या की तह तक जा सकते है ।क्या गिरा सेब, कैसे गिरा पेड़ से टूट कर मगर जब क्यो गिरा आया तब गुरुत्वाकर्षण मिला, क्यो आपको गुलामी से भी आजाद करता है इसलिए क्यो को गौण कर , सिर्फ क्या और कैसे पर जोर दिया गया। मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्दति का एक मात्र उद्देश्य था भारत पर अग्रेजो के शासन को आसान करना । जब हम अंग्रेजी शिक्षा पद्दति की बात करते है तो उसका अर्थ माध्यम / भाषा से बिल्कुल नही है माध्यम हिंदी/अंग्रेजी/मराठी /तमिल कुछ हो मायने नही रखता है, मायने रखता है शिक्षा देने का तरीका ।
शिक्षा का उद्देश्य होना चाइये की बच्चा ये सीखे की ,
कैसे सोचना है, ना कि क्या सोचना है 
मगर हमारी शिक्षा पद्दति बच्चो को सिलेबस और किताबो के दायरे में बांध देती है उनका सारा ध्यान किताबो में लिखी लाइनों को रटने में ही चला जाता है  । उसपर नम्बरों की अंधी दौड़ सब भाग रहे है मगर जाना कहाँ है किसी को नही पता , परीक्षा में 100% लाने वाले भी सैकड़ो बच्चे मिल जाते है, 98-99 की तो बाढ़ सी ही आ जाती है क्या शिक्षा का उद्देश्य इससे पूरा हो जाता है, सोचिए अगर किसी के 60-65 प्रतिशत रह जाये या गलती से फेल हो जाये ( गलती से इसलिए क्योकि आज की शिक्षा प्रणाली में परीक्षा में फेल होने की संभावना कम है चाहे वो जिंदगी में फेल हो जाये ) 
कम नम्बर या फेल होने पर आज के बच्चे अपने जीवन को भी समाप्त करने के कदम उठा लेते है , जो शिक्षा उन्हें जीवन मे मजबूती से खड़े होकर हर मुश्किल का सामना करने के लिये थी, उसने उसे इतना कमजोर बना दिया । क्योंकि सफल होने पर क्या करना है ये तो हम जानते है परन्तु असफल होने पर क्या करना है ये नही जानते , क्योकि कभी किसी ने हमे ये सिखाया ही नही। 
जबकि शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चो को मजबूत बनाना है, उन्हें इतना सक्षम बनाना के, वे जीवन की किसी भी परिस्थिति का डटकर मुकाबला कर सके ,उसके बाद ही किसी विषय का ज्ञान उनके काम आ सकता है ।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े , काके लागू पाय|
बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दियो बताय||
जो गुरु ईश्वर का मार्ग बात सकता है वो इन समस्याओं का समाधान भी कर सकता है। अगर एक गुरु ठान ले के उसे अपने शिष्यों का जीवन बदलना है , उनके भविष्य को उज्जवल बनाना है तो वो निश्चित रूप से ये कर सकता है।तभी शिक्षक दिवस की सार्थकता होगी, जब शिक्षा का सही उद्देश्य पूरा होगा। 
-AC

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