18/12/17

Right to education, शिक्षा का अधिकार

कोशिश .....An Effort by Ankush Chauhan
Right to education, शिक्षा का अधिकार

शिक्षा जो हर सभ्य समाज की मुख्य जरूरत है ताकि वो समाज वास्तविक तरक्की , आर्थिक के साथ वैचारिक तरक्की कर सके।
परन्तु आज अगर हम अपने देश में शिक्षा की स्तिथि को देखते तो लगता नही के हमारी सरकारों ने कभी इसे गंभीरता से लिया। जितना देश आगे की तरफ बढ़ रहा है शिक्षा वयवस्था उतनी पीछे की तरफ जा रही है। एक तरफ वो प्राइवेट स्कूल है जो फीस के नाम पर बच्चे के माँ बाप का खून भी चूस जाये। तो दूसरी ओर वो सरकारी स्कूल है जहाँ शिक्षा का बस नाम ही रह गया है। 


संविधान के छियासिवे संसोधन अधिनियम 2002 ने भारत के संविधान में निहित अनुच्छेद 21A में मौलिक अधिकार के रूप में 6  से 14 वर्ष के सभी बच्चो के लिये मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया तो 2009में शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया जिसमें निशुल्क और अनिवार्य बल शिक्षा अधिनियम 2009 में बच्चो का अधिकार जो 21A के तहत एकसमान गुणवक्ता वाली पुर्णकालिन प्राम्भिक शिक्षा प्रत्येक बच्चे का अधिकार है RTE अधिनियम जो 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ जिसमें निशुल्क और अनिवार्य शब्द जोड़ दिया गया।
इतना कुछ हुआ मगर कागजो में क्योकि सिर्फ कानून बनाने से क्या शिक्षा मिल गयी। जब हमारे देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक ही नही तो शिक्षा कहाँ से होगी सरकारी आकड़ो के अनुसार देश के प्राइमरी स्कूलों में लगभग 9 लाख शिक्षकों की कमी है । और ये कमी देश के लगभग हर राज्य में है।
और जो शिक्षक है भी उनमे कुछ  तो पढ़ाना नही चाहते । तो किसी को अन्य सरकारी कामो जैसे जनगणना , मतदान और मतगणना में लगा दिया जाता है। इसलिय सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या भी घटती जा रही है।
देश मे सरकारी स्कूल आज गरीबो का स्कूल ही बन गये क्योकि आज वही अपने बच्चो को सरकारी स्कूलों में डालते है जो प्राइवेट स्कूलों की मोटी फीस नही भर पाते नही तो लोगो ने आज अपनी हैसियत के हिसाब से प्राइवेट स्कूल चुन लिये । 
                                                   
सरकारी स्कूलों की खराब स्तिथि का फायदा ये मोटा मुनाफा कमाने वाले लोगों उठा रहे है। वो प्राइवेट स्कूल जिनके लिये शिक्षा सेवा नही बस एक धंदा है। आज कल ये स्कूल सिर्फ शिक्षा ही नही ड्रेस, कॉपी , पेंसिल और खाना सब बेच रहे है। एडमिशन के लिये मोटी रकम वसूली जाती है । कभी डेवलपमेंट के नाम पर तो कभी एक्टिविटी के नाम पर । और एक आम आदमी करे भी तो क्या वो अपने बच्चे के भविष्य के लिये सब कुछ करता है। क्योंकि देश की सरकारों ने शिक्षा का अधिकार कानून बना कर अपना दायित्व जो पूरा कर दिया है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिले ना मिले उसे सरकारों को क्या  मतलब । क्योकि अगर अच्छा पढ़ लिये तो कल अच्छी नौकरी मांगोगे । कम  से कम अब ये तो कहते हो के अच्छे स्कूल में नही पढ़ पाये इसलिय अच्छी नौकरी नही मिल पाई। सरकार को तो दोष नही देते।
मगर क्या शिक्षा और ज्ञान सिर्फ नौकरी के लिये होता है। अगर सरकारे हर नागरिक के लिये अच्छी शिक्षा की सही वयवस्था कर पाते है तो कल वो ज्ञान और शिक्षा देश के विकास में ही सहायक होगा। और जब हर नागरिक तक अच्छी और गुणवक्ता वाली शिक्षा आसानी से उपलब्ध होगी तभी इस शिक्षा के अधिकार कानून का कोई मतलब है। नही तो ये संविधान में लिखी एक लाइन मात्र है।
साथ ही हर शिक्षक को भी ये सोचने की आवश्यकता है के क्या हम अपने दायित्व को ईमानदारी से निभा रहे है। या हम सिर्फ एक सरकारी नौकरी कर रहे है। हमारे देश मे अनेको शिक्षक संघ है जो ना जाने कितने मुद्दों पर आंदोलन करते रहते है मगर कभी किसी ने शिक्षा व्यवस्था में सूधार के लिये सरकारों को कोई ज्ञापन नही दिया होगा किसी ने कभी स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ाने के प्रयास नही किये होंगे। 
                       
सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर का अनुमान इसी से लगया जा सकता है के ज्यादातर सरकारी शिक्षकों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में ही जाते है। अब ये कहना गलत न होगा के वो खुद अपनी दी हुई शिक्षा पर भरोसा नही करते।
सरकारी स्कूलों की स्तिथि सुधारने के लिये ये सुझाव भी गलत नही के सभी सरकारी कर्मचारियों के लिये अपने बच्चो को सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य होना चाहिये। शायद अपने बच्चों का भविष्य देखकर उनका ध्यान इनके सुधार की ओर जाये ।
बच्चे देश का भविष्य है और शिक्षा इसका आधार। बिना अच्छी शिक्षा के ये आधार विहीन अंधकार की और जाता भाविष्य बहुत खतरनाक है।

अब अंत मे RTE(right to education)  के प्रवधानों को जान लेते है भारत सरकार के अनुसार Source http://mhrd.gov.in/hi/rte-hindi

आरटीई अधिनियम निम्‍नलिखित का प्रावधान करता है :

किसी पड़ौस के स्‍कूल में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने तक नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा के लिए बच्‍चों का अधिकार।
यह स्‍पष्‍ट करता है कि 'अनिवार्य शिक्षा' का तात्‍पर्य छह से चौदह आयु समूह के प्रत्‍येक बच्‍चे को नि:शुल्‍क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने और अनिवार्य प्रवेश, उपस्थिति और प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करने को सुनिश्चित करने के लिए उचित सरकार की बाध्‍यता से है। 
'नि:शुल्‍क' का तात्‍पर्य यह है कि कोई भी बच्‍चा प्रारंभिक शिक्षा को जारी रखने और पूरा करने से रोकने वाली फीस या प्रभारों या व्‍ययों को अदा करने का उत्‍तरदायी नहीं होगा।
यह गैर-प्रवेश दिए गए बच्‍चे के लिए उचित आयु कक्षा में प्रवेश किए जाने का प्रावधान करता है। 
यह नि:शुल्‍क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने में उचित सकारों, स्‍थानीय प्राधिकारी और अभिभावकों कर्त्‍तव्‍यों और दायित्‍वों और केन्‍द्र तथा राज्‍य सरकारों के बीच वित्‍तीय और अन्‍य जिम्‍मेदारियों को विनिर्दिष्‍ट करता है।
यह, अन्‍यों के साथ-साथ, छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर), भवन और अवसंरचना, स्‍कूल के कार्य दिवस, शिक्षक के कार्य के घंटों से संबंधित मानदण्‍डों और मानकों को निर्धारित करता है।
यह राज्‍य या जिले अथवा ब्‍लॉक के लिए केवल औसत की बजाए प्रत्‍येक स्‍कूल के लिए रखे जाने वाले छात्र और शिक्षक के विनिर्दिष्‍ट अनुपात को सुनिश्चित करके अध्‍यापकों की तैनाती के लिए प्रावधान करता है, इस प्रकार यह अध्‍यापकों की तैनाती में किसी शहरी-ग्रामीण संतुलन को सुनिश्चित करता है। 
यह दसवर्षीय जनगणना, स्‍थानीय प्राधिकरण, राज्‍य विधान सभा और संसद के लिए चुनाव और आपदा राहत को छोड़कर गैर-शैक्षिक कार्य के लिए अध्‍यापकों की तैनाती का भी निषेध करता है।
यह उपयुक्‍त रूप से प्रशिक्षित अध्‍यापकों की नियुक्ति के लिए प्रावधान करता है अर्थात अपेक्षित प्रवेश और शैक्षिक योग्‍यताओं के साथ अध्‍यापक।
यह (क) शारीरिक दंड और मानसिक उत्‍पीड़न; (ख) बच्‍चों के प्रवेश के लिए अनुवीक्षण प्रक्रियाएं; (ग) प्रति व्‍यक्ति शुल्‍क; (घ) अध्‍यापकों द्वारा निजी ट्यूशन और (ड.) बिना मान्‍यता के स्‍कूलों को चलाना निषिद्ध करता है।
यह संविधान में प्रतिष्‍ठापित मूल्‍यों के अनुरूप पाठ्यक्रम के विकास के लिए प्रावधान करता है और जो बच्‍चे के समग्र विकास, बच्‍चे के ज्ञान, संभाव्‍यता और प्रतिभा निखारने तथा बच्‍चे की मित्रवत प्रणाली एवं बच्‍चा केन्द्रित ज्ञान की प्रणाली के माध्‍यम से बच्‍चे को डर, चोट और चिंता से मुक्‍त बनाने को सुनिश्चित करेगा।

अगर हम RTE  कानून के तहत लिखी गयी इन लाइन को पढ़े तो लगता है हमारी शिक्षा व्यवस्था कितनी अच्छी है जो शायद अच्छी शिक्षा के लिए आवश्यक लगभग सभी बिन्दुओ को समाहित किये हुए है।  नि:शुल्‍क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने और अनिवार्य प्रवेश, उपस्थिति और प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करने को सुनिश्चित करना , छात्र और शिक्षक के विनिर्दिष्‍ट अनुपात को सुनिश्चित करके अध्‍यापकों की तैनाती,  गैर-शैक्षिक कार्य के लिए अध्‍यापकों की तैनाती का भी निषेध, शारीरिक दंड और मानसिक उत्‍पीड़न;  अध्‍यापकों द्वारा निजी ट्यूशन और बिना मान्‍यता के स्‍कूलों को चलाना निषिद्ध , भवन और अवसंरचना, स्‍कूल के कार्य दिवस, शिक्षक के कार्य के घंटों से संबंधित मानदण्‍डों और मानकों का निर्धारण 
देखा जाये तो कानून में सबकुछ है मगर क्या ये सही से लागु हो पाया ,क्या कभी सरकारों ने या  हमने कोई प्रयास किया इसके लिए शायद ये सबकी जिम्मेदारी है सरकारी , गैर सरकारी सामाजिक संगठनों सबको मिलकर प्रयास करना होगा क्योकि सवाल देश के भविष्य का है।  
आओ मिलकर प्रयास करे , देश के उज्वल भविष्य के लिए  अपने विचार और सुझाव हमें कमेंट में जरूर लिखे या मेल करे 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें